'जीवन का स्वभाव'

#जीवन क्या हैं?
जीवन हमारा बनाया हुआ नहीं हैं। जीवन परमात्मा ने बनाया हैंं और परमात्मा ने जीवन का स्वभाव बनाया हैं,वह हैं आनंद। जीवन दुःख के लिए परमात्मा ने नहीं बनाया हैं।इंसान अपने मूल स्वभाव के अनुरूप नहीं चलता तभी जीवन हमें दुःखों से ,कठिनाइयों से भरा एहसास होने लगता हैं।यदि इंसान अपने मूल स्वभाव के अनुरूप चलें तो वह हमेशा आनंदित रहेगा।
    आप कहेंगे कि यह कौन-सा विषय हो गया हैं।यह तो सभी जानते हैं और सब इसके लिए प्रयास भी करते हैं।यह तो कहने की बात हो गई, लेकिन हम चारों तरफ निगाह करें, तो दिखाई देगा कि हर कोई दुःखों को खोज रहा हैं।उसके सारे कृत्य ऐसे हो रहे हैं, जो दुःखों को बढ़ावा दे रहे हैं।
                     इसीलिए ऊपरी तौर पर सब जानते है कि जीवन का स्वभाव आनंद हैं, पर भीतर स्मृति में यह बात लगातार रहती नहीं हैं।यहाँ तक कि लोग आनंद को पाप तक बताते हैं।उन्होंने दुःख को ही जीवन का सत्य समझ लिया हैं।वे लोगों को कष्ट उठाने की शिक्षा और प्रेरणा देते हैं।कहते हैं कि इस जन्म में जितना ज्यादा कष्ट उठाओगे, अपने शरीर को जितनी ज़्यादा तक़लीफ़ दोगे,उतना ही अगले जन्म में सुख मिलेगा।आखिर चाहिए उन्हें भी सुख ही,लेकिन एक गलत धारणा उन्होंने पाल ली।
#क्या दुःख-कष्ट भोगना ही जीवन हैं?
   पूर्व में किसी बुद्ध पुरुष के साथ ऐसा हुआ होगा कि कितने भी कष्टकारी अवस्था में आनंद को महसूस कर पा रहा होगा।वह अपने मूल स्वभाव में इतना चला गया होगा कि उसे कोई और बाहरी कष्ट उस आनंद की अवस्था से बाहर नहीं कर पा रहा होगा।कभी उसने जानकार कष्टों को नहीं बुलाया होगा।उसने यह शिक्षा नहीं दी होगी कि सारी ऊर्जा को कष्टों को खोजने में लगा दो।उसने यह शिक्षा दी होगी कि कितनी भी कष्टकारी स्थिति आ जाये, अपनी आनंद अवस्था को मत भूलों, लेकिन कुछ लोगों ने इस बात को पूरा उलट दिया हैं।वे कहते हैं कि जितने ज़्यादा कष्ट उठा सकते हो, तब तक कष्ट ढूंढते रहों और उठाते रहो। परमात्मा द्वारा दी गई इस पुण्य काया का इससे बड़ा निरादर और कोई नहीं हो सकता। ये जो दुःख सृजन करनेवाले लोग हैं, वे बड़े खतरनाक हैं।

 #आखिर जीवन में दुःख-कष्ट क्यों होता हैं?
     इसका सबसे बड़ा कारण हैं, अपने मूलस्वभाव के अनुरूप न चलकर..दुनिया वालों के कहें अनुसार जीवन को जीना।दिखावें की जिंदगी जीना।इंसान के शरीर की हत्या करना छोटी बात हैं, पर इंसान के मूल स्वभाव की हत्या करना बड़ा खतरनाक अपराध है। आज ऐसे लोग हैं जो अधिकतर कहते हैं कि, जितना आपका जीवन कष्ट पूर्ण होगा, उतना ही बाद में आपका जीवन सुखमय होगा।
          कोई मनुष्य तरह-तरह के कष्ट भोगकर अपने आपको दूसरों से अलग तो कर सकता हैं।अपने आपको विशिष्ट बना सकता हैं, लेकिन वह दूसरों के जीवन में आनंद नहीं भर सकता हैं,क्योंकि वह तो कष्ट की शिक्षा दे रहा हैं।उसकी सोच में कष्ट ही कष्ट हैं।वह आनंद की भी बात करेगा, तो झूठी होगी।क्योंकि उसनें न आनंद को जाना हैं, न उसे कभी महसूस किया हैं।
वैसे भी कष्ट इंसान की सोच को संकुचित कर देता हैं।कष्ट इसलिए भोगना हैं, क्योंकि उनको उसमें स्वयं का कुछ कल्याण दिखाई दे रहा हैं।कष्ट भोगने में दूसरे की आवश्यकता नहीं हैं।बल्कि दूसरों से बिल्कुल अलग होना पड़ता हैं।कष्ट की अवधारणा पूर्णतया स्वार्थमयी हैं, जबकि आनंद में जितने लोग दूसरे लोग शामिल होते जायेंगे, उतना ही आनंद बढ़ता जायेगा। 
       आनंद इंसान के सोच को विस्तृत करता हैं।उसका दायरा असीमित हो जाता हैं।उसकी गतिविधियां स्वतः ऐसी हो जाती हैं, जो दूसरों को आनंद प्रदान करें।इस बात की बहुत ज़्यादा जरूरत है कि, इन्सान इस बात को सीख जाये।हर पल इस बात को ध्यान में रखें कि जीवन का स्वभाव आनंद हैं। 
                                बात जितनी आसान लग रही हैं, उससे थोड़ी कठिन हैं।इस दिशा में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं कि, इस बात को स्मृति में रखना कि हर पल मुझे आनंद अवस्था में रहना है, अपने आप सारी सोच, सारे कृत्य सुधर जायेंगे।जीवन की दिशा ही बदल जायेगी।ये जीवन में चापूसियाँ,चालाकियाँ, नकलीपन, दूसरों को धोखा देना,सब कुछ निकल जायेगा।क्योंकि जो भीतरी आनंद अवस्था की दशा में हो,वह यह सब कुछ नहीं कर सकता।ये सब जीवन के आनंद को समाप्त करने वाली बातें वह सोच भी नहीं सकता।बड़े से बड़ा तथाकथित धार्मिक व्यक्ति भी जालसाजी़ इसलिये कर लेता हैं, क्योंकि वह अपने मूल स्वभाव को भूला हुआ हैं।वह धर्म का भी ढोंग कर रहा होता हैं।भीतर की कोई यात्रा नहीं हैं।
कुछ लोगों को दुःख में ही रहने की आदत सी हो जाती हैं।वे जहाँ दुःख नहीं होता, वहाँ भी दुःख ढ़ूंढ़ लेते हैं।जब धन नहीं होता तो, धन नहीं होने का दुःख।जब धन आने लगता है तो, और कैसे आ सकता हैं इसका दुःख।जब और धन आ जाता हैं,तो उसे सम्भालने का दुःख।कहीं धन कम न हो जाये,इसका दुःख।यानी हर स्थिति में दुःखी होना हैं व्यक्ति को।
#दिखावें की जिंदगी जीना हैं, आज के दौर में दुःख कष्ट पाने का सबसे बड़ा कारण।
एक महिला का जन्मदिन था।एक पार्टी आयोजित की गई।पार्टी इसलिए आयोजित होना चाहिये था कि, इस अवसर पर सभी द्वारा आनंद उत्सव मनाया जा सके।पर शायद यहाँ उद्देश्य कुछ अलग था।जान पहचान में इज़्ज़त का सवाल था।सबकी पार्टियों में जाते हैं, हम नहीं करेंगे तो लोग क्या कहेंगे? पार्टी का क्या निश्चय हुआ, जैसे घर में तनाव शुरू हो गया।हर बात में मतभेद।पति को कौन सी जगह पसंद है तो, पत्नी बोलती हैं, जन्मदिन मेरा हैं या आपका।मेरी पसंद की जगह होनी चाहिये।बच्चे कुछ और ही कह रहे हैं।हर बात में वहीं तनाव।खाने में क्या होगा? किस-किस को बुलाना हैं?कार्यक्रम कैसे होगा?यह सब तय करने में न जाने कितनी बार झगडा हुआ।पति मन ही मन बार बार सोच रहा था पता नहीं किसने यह जन्मदिन पार्टी का सिस्टम बनाया।

जिन-जिन को बुलाया गया था, वहाँ भी कुछ कम नहीं था।क्या पहनना हैं।गिफ्ट क्या देना है।मेरी बर्थडे पर उसने क्या दिया था।न जाने कितनी तरह की उलझनें। किसी का पति शाम को जल्दी नहीं आ पाया, पत्नी तैयार होकर बैठी हैं और गुस्सा कर रही हैं।किसी को कोई दूसरा काम छूट जाने का तनाव।
अपनी इज़्ज़त बनाकर रखने के लिए महिला के पति व बच्चों ने मिलकर एक कार उसको जन्मदिन पर तोहफे़  में दी।सब बड़ी खुशी दिखा रहे थे।मन ही मन कई महिलाएं सोच रही थी, देखों इनके घर में कितना अच्छा हैं।एक दूसरे से कितना प्यार करते हैं? हमारे पति ने तो कभी अच्छा तोहफ़ा लाकर नहीं दिया।
पार्टी समाप्त हुई।सब लोग चले गए।घर पर सबके चहेंरो पर जो हँसी दिखाई दे रही थी, पता नहीं कहाँ गा़यब हो गई, जैसे कोई नक़ली मुखौटा लगा रखा था, जो पार्टी खत्म होते ही उतार दिया गया।पत्नी बोली कार ही देनी थी,तो कम से कम मेरी पसन्द की तो देते और नाम मेरा कर दिया और चलायेंगे सभी।
जब आप दूसरो को दिखाने के चक्कर में पड़ जाते हैं, तो यह नकलीपन बड़ी तक़लीफ़ देता हैं।हर समय यही चिंता खाये जाती हैं कि लोग क्या कहेंगे।अच्छे से अच्छे खुशी के अवसर को सिर्फ इस बात के पीछे दुःख में बदल देते हैं कि लोग क्या कहेंगे।इसलिए यह कहावत बन गई हैं, कि 'सबसे बड़ा रोग, क्या कहेंगे लोग'।

#जीवन में चाहते हैं,आनंद तो अपने मूलस्वभाव को जाने-उसका स्मरण करें।
कुछ लोगों को दुःखी रहने की इतनी आदत हो जाती हैं कि सब कुछ ठीक चल रहा होता हैं, सारी बात खुशी की है, लेकिन उनको जैसे असामान्य सा लगता हैं।वे ऐसी में भी दुःख की कल्पना करने लग जाते हैं।वर्तमान में कुछ ग़लत नज़र नहीं आ रहा हो, तो भविष्य की आशंकाओं से भर जाते हैं।यह सब  इसलिये होता हैं कि, वे अपने मूलस्वभाव का स्मरण नहीं रखते हैं।यदि मूलस्वभाव का स्मरण हर पल रहे, तो इन्सान हर समय आनंदित रह सकता हैं।वह भी भीतरी आनंद।इसका अभ्यास करें।अभ्यास करते करते एक दिन ऐसा आयेगा कि,हर जगह हर परिस्थिति में आनंद ही आनंद का एहसास होगा।
   आश्चर्य होगा कि जो इंसान कहता हैं कि, संसार दुःख का सागर हैं, वही इंसान अपने मूलस्वभाव का स्मरण करते हुए आनंद में रहने लग जायेगा, तो उसके चारों तरफ का माहौल भी आनंदमय हो जायेगा और वह कहेगा संसार आनंद का सागर हैं।दुःख और आनंद दोनों ही भावजगत की देन हैं।बाहरी जगत में इनका कोई नाता नहीं हैं।
                 बात स्मरण में आने की देर हैं,बस जिस तरह फूल का स्वभाव खिलना हैं,हवा का स्वभाव बहना हैं, पानी का स्वभाव है शीतलता।पानी को आप कितना भी गरम करो,जैसे ही उसको अपनी अवस्था में छोड़ोगे, वह पुनः शीतल हो जायेगा, लेकिन यदि पानी को लगातार गर्म करते ही रहोगे तो,वह अपने मूलस्वभाव में कैसे आ पायेगा?उसी प्रकार यदि जीवन में दुःखों का ही स्मरण करते रहोगे तो, जीवन अपने मूलस्वभाव में नहीं आ पायेगा।
यदि आप भावों को निष्क्रिय कर दो और पूर्ण शांत अवस्था में चले जाओं,तो चित्त स्वतः आनंद अवस्था में चला जाएगा।क्योंकि वह उसका मूलस्वभाव हैं।आनंद तो बिना प्रयास भी मिल सकता हैं, लेकिन दुःखों के लिए तो भावों में जाना ही पड़ेगा, कुछ प्रयास करना ही पड़ेगा और जब प्रयास ही करना हैं तो, दुःख के लिए क्यों?आनंद के लिए क्यों? न किया जाये।

#रह सकते हैं.. यूं आनंदित-
अभ्यास के लिए उन पलों का स्मरण करो,जब आपके जीवन में असीम आनंद का अनुभव हुआ हो,जब जब कुछ सकारात्मक घटा हो।हमारी कुछ आदत-सी हो गई हैं कि हम नकारात्मक बातों को ज़्यादा स्मरण करते हैं।किसी में १०० अच्छाई हैं, तो उसकी बात नहीं करेंगे, लेकिन एक बुराई है तो उसे जरूर याद रखेंगे और उसी ने कभी हमारा सम्मान किया हो तो उसे भूल जायेंगे।कोई अप्रिय बात हो गई हो तो,बड़े जोर-जोर से चर्चा करेंगे, लेकिन कोई प्रिय बात हो गई हो तो,उसे सामान्य समझ कर भूल जायेंगे।क्या शौक चढ़ा हैं, ऐसे दुःखों को खोजने का?क्यों पानी को गरम करने में लगे हो।उसे अपने शीतलता में रहने दो।जीवन के आनंद कमल को खिलने दो।उसमें बाधक मत बनों।परमात्मा द्वारा दी गई सौगात का यों अपमान मत करों।

#आनंद का अर्थ-धन या भोगविलासिता नहीं।
 ज्यादातर लोग आनंद में तो रहना चाहते हैं, पर वे आनंद को मात्र धन या भोगविलासिता में समझते हैं।धन का अपनी जगह महत्व हैं,लेकिन केवल भोगविलासिता को आनंद का स्त्रोत समझना बहुत बड़ी भूल हैं।धन का इतना ही महत्व है कि वह बाहरी आवश्यकताओं को पूरा करता रहे,ताकि ये बाहरी आवश्यकताएँ भीतरी यात्रा को बार-बार विचलित न करें,लेकिन धन को अंतिम आनंद मान लेना आनंद से दूर होना हैं।इसी के चलते कई लोग धन लोलुप हो जाते हैं।येन-केन प्रकारेण धन पाना चाहते हैं।वे दूसरों के साथ चापलूसियाँ और धोखाधड़ी में लग जाते हैं और असली आनंद से दूर होते जाते हैं।वे भोगविलासिता के चक्कर में कर्ज ले लेते हैं।धन से जीवन में आनंद मिलता हैं, यदि इसके महत्व को ठीक से समझले तो।
              आनंदमय होने का तरीका थोड़ा अलग है।अपने आपके भावों को विकार मुक्त करना, व्यर्थ की चेष्टाओं और आकांक्षाओं से मुक्त करना, यहीं आनंद अवस्था हैं।इसमें कोई चापलूसी नहीं चल  सकती हैं।यह दूसरों को दिखाने के लिए नहीं है।यह भीतर की बात हैं।
पानी का स्वभाव शीतलता हैं,पर यदि पानी को दिनभर आग की भट्टी पर रखोगे तो,क्या वह शीतल रह पायेगा।इसी प्रकार यदि भावों को भी दिनभर विकारों, अनर्गल चेष्टाओं ,आकांक्षाओंं या डर की भट्टी पर रखोगे तो,क्या वे आनंद अवस्था में रह पायेंगे।

#जीवन की नश्वरता को रखें हर पल याद और हर पल रहें..आनन्दित।
हमारे यहाँ मृत्यु के बारे में बड़ी शिक्षा दी जाती हैं कि, मृत्यु एक शाश्वत सत्य हैं। जो भी जन्मा हैं उसकी मृत्यु निश्चित हैं।जो भी जीव जन्म लेता हैं, वह उसी क्षण से मृत्यु के साथ-साथ चलता है।किसी भी क्षण वह मृत्यु को प्राप्त कर सकता हैं।हर पल इंसान को मृत्यु का बोध होना चाहिये।केवल शरीर मरता है,आत्मा अजर अमर है। क्या साथ लेकर आये थे,क्या साथ लेकर जाओगे।यह शरीर मिट्टी का पुतला हैं,इसका इतना मोह मत करों।जीवन चन्द घडि़यो का खेल है।इस प्रकार की अनेक शिक्षाएँ हमें दी जाती हैं।
                               क्या इस दुनिया में एक भी व्यक्ति ऐसा हुआ है जो यह कह पाया हो कि जीवन जब एक खेल ही है तो, मैं क्यों इतनी मेहनत करूँ।क्यों न इसको ऊपर वाले के भरोसे छोड़ दूँ, जो होगा सो हो जायेगा।बचा तो मैं वैसेभी नहीं सकता।कितनी भी कोशिश करेगा, तो भी वह नहीं कर पायेगा।आत्महत्या भी कोई इस  सोच से नहीं करता।वह तो अपने भावों को विकारों की भट्टी पर इतना ज़्यादा तपा लेता हैं कि वह आनंद की एकदम विपरीत दिशा अवस्था में चला जाता हैं,अन्यथा यह किसी भी इन्सान के वश में है ही नहीं।

 क्योंकि परमात्मा ने मनुष्य का स्वभाव सृजनात्मक बनाया है। सृजनात्मकता आनंद का ही रूप है।इंसान जैसे ही मृत्यु बोध में जाएगा, वह तत्काल यही सोचेगा कि मैं कुछ न कुछ सृजन करके जाऊँ,क्योंकि यही उसका स्वभाव है।अलग अलग व्यक्ति की गतिविधियां अलग-अलग हो सकती हैं।जीवन को मिथ्या धारणाओं में जकड़ लेने से उनके निर्णय विपरीत भी हो सकते हैं,पर यह निश्चित है कि.. जीवन का स्वभाव दुःख नहीं हैं, उसका स्वभाव आनंद हैं।
 आशा करता हूँ... आपको ये पोस्ट अच्छी लगी होगी।और जीवन के स्वभाव के बारे में जानने में अवश्य मार्गदर्शन मिला होगा। 
आपका बहुत बहुत आभार..धन्यवाद! इस पोस्ट को पूरा तक पढ़ने के लिए।
🙏🙏

       

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